विकास की ऊंची उड़ान और जलजमाव का पुराना दर्द: क्या वाकई बदल रहा है दरभंगा?
दरभंगा में एयरपोर्ट, एम्स और मखाना उद्योग के विस्तार से विकास की नई गति मिली है, लेकिन शहर अब भी जलजमाव और बुनियादी ढांचे की पुरानी समस्याओं से जूझ रहा है। क्षेत्र के वास्तविक उत्थान के लिए बड़े प्रोजेक्ट्स के साथ-साथ जल निकासी और सुगम यातायात जैसी जमीनी सुविधाओं को दुरुस्त करना अनिवार्य है।
यदि आप आज से दस साल पहले के दरभंगा को याद करें, तो जेहन में एक शांत, सांस्कृतिक और धीमे मिजाज का शहर उभरता था। लेकिन आज का दरभंगा बदल चुका है। आज जब हम दिल्ली मोड़ की तरफ से गुजरते हैं, तो चमकती हुई फोरलेन गाड़ियां, नए बस टर्मिनल की रूपरेखा और आसमान में गूंजती स्पाइसजेट के विमानों की आवाज बताती है कि हमारा शहर करवट ले रहा है।
पर क्या यह तरक्की सच में हर आम दरभंगा वासी के दरवाजे तक पहुंची है? चलिए आज चाय की चुस्की के साथ इस पर थोड़ी खरी-खरी बात करते हैं।
उड़ते जहाज और थमते पहिए: एक अजीब विरोधाभास
इसमें कोई शक नहीं कि दरभंगा एयरपोर्ट ने हम मिथिला वासियों की जिंदगी आसान कर दी है। जो लोग दिल्ली, मुंबई या बेंगलुरु में रहते थे, उनके लिए घर आना अब चंद घंटों का खेल है। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी देखिए। जब भी मौसम खराब होता है या कोई तकनीकी खराबी आती है, तो हमारे यात्री घंटों फंसे रहते हैं। रनवे और सिविल एन्क्लेव के विस्तार की बातें सालों से फाइलों में तैर रही हैं।
ठीक यही हाल हमारे शहर की सड़कों का है। एक तरफ हमारे मुख्यमंत्री जी 138 करोड़ से अधिक की योजनाओं की सौगात देते हैं, 'ईज ऑफ लिविंग' (Ease of Living) की बैठकें होती हैं, तो दूसरी तरफ थोड़ा सा मानसून आते ही शहर की नसें चोक हो जाती हैं। लहेरियासराय से लेकर टावर चौक तक, चमचमाती गाड़ियां पानी में तैरती नजर आती हैं। क्या हमारी नगर निगम और प्रशासन इन समस्याओं का कोई स्थायी समाधान नहीं निकाल सकते?
एक बड़ा सवाल: जब शहर में 2000 करोड़ की लागत से एम्स (AIIMS) के निर्माण की नींव मजबूत की जा रही है, नदियों के गाद से समतलीकरण हो रहा है, तो क्या उसी मुस्तैदी से हमारे मोहल्लों के नालों को ठीक नहीं किया जा सकता?
मखाना और मेधा: हमारी असली ताकत
इन सब दिक्कतों के बीच जो चीज हमें कभी निराश नहीं होने देती, वह है यहाँ के लोगों का जज्बा। आज हमारे मखाने को वैश्विक पहचान मिल रही है। ओमान जैसे देशों के साथ हुए समझौतों ने हमारे स्थानीय किसानों और युवाओं के लिए एक्सपोर्ट के नए दरवाजे खोले हैं।
इसके साथ ही, ललित नारायण मिथिला यूनिवर्सिटी (LNMU) में जिस तरह से नए जॉब-ओरिएंटेड कोर्सेज को मंजूरी मिली है, वह इस बात का संकेत है कि अब हमारे बच्चों को रोजगार के लिए सिर्फ पारंपरिक डिग्रियों के भरोसे नहीं बैठना होगा। हमारा युवा अब सिर्फ नौकरी ढूंढने वाला नहीं, बल्कि मखाना प्रोसेसिंग, लॉजिस्टिक्स और डिजिटल मीडिया के जरिए नौकरी देने वाला बन रहा है।
आगे की राह: हमें कैसा दरभंगा चाहिए?
हमें ऐसा दरभंगा नहीं चाहिए जो सिर्फ कागजों पर 'स्मार्ट' हो। हमें ऐसा दरभंगा चाहिए जहाँ:
हवाई जहाज भी वक्त पर उड़े और सड़कों पर जलजमाव भी न हो।
एम्स जैसी विश्वस्तरीय स्वास्थ्य सुविधाएं भी मिलें और सदर अस्पताल की व्यवस्था भी दुरुस्त रहे।
हमारे युवाओं को अपनी माटी छोड़कर पलायन न करना पड़े।
दरभंगा सिर्फ एक जिला या शहर नहीं है, यह पूरी मिथिला संस्कृति का दिल है। विकास का स्वागत है, लेकिन वह विकास हमारी रोजमर्रा की जिंदगी को आसान बनाने वाला होना चाहिए, पेचीदा बनाने वाला नहीं।
आपकी इस पर क्या राय है? क्या आपको लगता है कि बड़े प्रोजेक्ट्स के बीच हमारे शहर की बुनियादी समस्याएं पीछे छूट रही हैं? नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर साझा करें।
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